Friday, July 01, 2011

नैनों में बदरा छाये..


एक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थे..याद है न तुम्हे...आज कल जब भी बारिश होती है..मन पीछे लौट जाता है..पता नहीं क्यूँ वो दिन इतना याद आते हैं..कई बार तो नींद में चौंक के उठ जाती हूँ..ये क्या देख रही थी मैं...वहां कैसे पहुँच गयी..वो पहली बारिश..वो कॉफी..घूमना मस्ती करना..कहाँ चला गया वो सब..हम तो अभी भी वही हैं पर वो बेफिक्री कहाँ है...वो अल्हड़पन ..बारिश अब भी भिगा जाती है..पर मैं नहीं भीग पाती..
कोई जवाब है क्या तुम्हारे पास..




नहीं..




..पता है मुझे तुम कभी कुछ नहीं बोलोगे..तुम्हारी ख़ामोशी के ही  इंतज़ार में..
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मैं.. ..

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